उपनिवेशवाद का प्रभाव केवल भारत के मुख्यधारा के समाज पर ही नहीं पड़ा, बल्कि यह जनजातीय समाजों पर भी गहरा असर छोड़ गया। जनजातीय समाज, जो स्वायत्त और आत्मनिर्भर होते थे, उपनिवेशवाद के कारण बड़े पैमाने पर बदल गए। ब्रिटिश शासन ने जनजातीय समुदायों की पारंपरिक जीवनशैली, कृषि, वनोपज और सामाजिक संरचना पर सीधा प्रभाव डाला।

BSEB Class 8 Social science History Chapter 4 Notes “उपनिवेशवाद एवं जनजातीय समाज” में इन बदलावों और उनके परिणामों को विस्तार से समझाया गया है।
BSEB Class 8 Social science History Chapter 4 Notes-उपनिवेशवाद एवं जनजातीय समाज
जनजातीय समाज: परंपरागत जीवनशैली:- भारत का जनजातीय समाज विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों में फैला हुआ है। इन समुदायों के लोग अक्सर पहाड़ी, वन्य और दूरदराज के इलाकों में रहते हैं। उनकी जीवनशैली परंपरागत रूप से प्रकृति पर आधारित होती है। मुख्य रूप से कृषि, शिकार, वनोपज और हस्तशिल्प इनकी आजीविका के प्रमुख साधन होते हैं।
- आर्थिक गतिविधियाँ: जनजातीय समाज की आर्थिक गतिविधियाँ कृषि, पशुपालन, और वन संसाधनों पर निर्भर करती थीं। कई जनजातियाँ स्थानांतरित कृषि (झूम खेती) करती थीं, जिसमें वे एक क्षेत्र में खेती करने के बाद दूसरे क्षेत्र में जाते थे।
- सामाजिक संरचना: जनजातीय समाजों में सामाजिक संरचना का आधार उनकी परंपरागत रीति-रिवाज और मान्यताएँ होती थीं। अधिकांश जनजातियाँ स्वयंशासित होती थीं, जहाँ एक प्रमुख या मुखिया द्वारा समुदाय का नेतृत्व किया जाता था।
- धार्मिक आस्था: जनजातीय समाज प्राकृतिक देवी-देवताओं की पूजा करते थे। वे प्रकृति को पवित्र मानते थे और नदी, पहाड़, जंगल जैसी प्राकृतिक चीजों की पूजा करते थे।
ब्रिटिश उपनिवेशवाद का आगमन:- ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में उपनिवेशवाद तेजी से फैला और इसका असर जनजातीय समाज पर भी पड़ा। ब्रिटिश सरकार ने भारत की आर्थिक और सामाजिक संरचना को अपने अनुसार ढालने का प्रयास किया, जिसमें जनजातीय क्षेत्रों की भूमि और वन संसाधनों का दोहन प्रमुख था।
भूमि और वन कानूनों का प्रभाव: ब्रिटिश सरकार ने 19वीं शताब्दी में कई ऐसे कानून बनाए जिनका सीधा असर जनजातीय समाज पर पड़ा। इन कानूनों के तहत जनजातीय क्षेत्रों की भूमि पर सरकार का अधिकार स्थापित किया गया।
- वन अधिनियम: ब्रिटिश सरकार ने कई वन अधिनियम लागू किए, जिनके माध्यम से उन्होंने वनों पर अपना अधिकार जमाया। इससे जनजातीय समुदायों को उनके पारंपरिक वनों से बेदखल कर दिया गया। उनके लिए शिकार, लकड़ी और वनोपज पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
- भूमि अधिग्रहण: जनजातीय भूमि पर बाहरी लोगों का कब्जा बढ़ गया। ब्रिटिश सरकार ने भूमि को राजस्व प्राप्ति का एक साधन माना, और उन्होंने भूमि का बड़े पैमाने पर अधिग्रहण किया। इससे जनजातीय लोग भूमिहीन होते गए और उन्हें मजदूरी के लिए मजबूर होना पड़ा।
उपनिवेशवादी नीतियों के कारण जनजातीय समाज के परिवर्तन: ब्रिटिश नीतियों ने जनजातीय समाज को न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी प्रभावित किया। उनकी पारंपरिक जीवनशैली में बदलाव आया और उनके परंपरागत अधिकारों का हनन हुआ।
- मजदूरी प्रणाली: भूमिहीन होने के कारण कई जनजातीय लोग मजदूरी करने लगे। उन्हें अपने ही वनों में मजदूरी करनी पड़ती थी। ब्रिटिश सरकार ने उनसे सस्ते श्रम के रूप में काम लिया।
- शोषण और उत्पीड़न: ब्रिटिश अधिकारियों और जमींदारों द्वारा जनजातीय लोगों का शोषण किया गया। उन्हें अत्यधिक करों का बोझ सहना पड़ा और कई बार उनकी जमीनें भी छीन ली गईं।
जनजातीय विद्रोह और संघर्ष:- ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनजातीय समाजों ने कई विद्रोह किए। ये विद्रोह उनकी स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा के लिए किए गए थे।
संथाल विद्रोह (1855-1856): संथाल जनजाति का विद्रोह ब्रिटिश शासन के खिलाफ सबसे प्रमुख जनजातीय विद्रोहों में से एक था। संथाल लोग बंगाल, बिहार और उड़ीसा में बसे थे। भूमि अधिग्रहण, अत्यधिक कर और शोषण के कारण संथालों ने अंग्रेजों और जमींदारों के खिलाफ विद्रोह किया।
- कारण: संथालों की भूमि पर कब्जा, अत्यधिक करों का बोझ और बाहरी लोगों का हस्तक्षेप।
- परिणाम: विद्रोह को अंग्रेजों ने बलपूर्वक दबा दिया, लेकिन इसने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनजातीय समाज की असहमति को उजागर किया।
भील और गोंड विद्रोह:- भील और गोंड जनजाति भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह करने में अग्रणी थीं। वे पश्चिमी और मध्य भारत के जंगलों में बसे थे और उनके पारंपरिक अधिकारों का हनन होने पर उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ संघर्ष किया।
- कारण: वन अधिकारों का हनन, भूमि छीनना और ब्रिटिश अधिकारियों का अत्याचार।
- परिणाम: भील और गोंड विद्रोह को भी दबा दिया गया, लेकिन इससे यह स्पष्ट हो गया कि जनजातीय समाज अंग्रेजी शासन के खिलाफ था।
कोल विद्रोह (1831-1832): कोल जनजाति का विद्रोह भी ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक महत्वपूर्ण विद्रोह था। कोल जनजाति झारखंड और छत्तीसगढ़ के क्षेत्रों में बसती थी। उनके वन अधिकारों और भूमि पर ब्रिटिश हस्तक्षेप के कारण यह विद्रोह हुआ।
- कारण: भूमि और वन अधिकारों का हनन, कर प्रणाली और बाहरी लोगों का हस्तक्षेप।
- परिणाम: कोल विद्रोह को भी ब्रिटिश सेना ने दबा दिया, लेकिन इससे जनजातीय समाज की स्वतंत्रता की लड़ाई को एक नई दिशा मिली।
जनजातीय समाज में बदलाव: ब्रिटिश शासन के कारण जनजातीय समाज की परंपरागत संरचना में कई बड़े बदलाव हुए। उनकी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना प्रभावित हुई और वे अपनी पारंपरिक आजीविका के साधनों से वंचित हो गए।
- भूमिहीनता: ब्रिटिश भूमि अधिग्रहण नीतियों के कारण जनजातीय लोग भूमिहीन हो गए। इससे उनकी पारंपरिक कृषि और स्थानांतरित खेती की प्रथा पर भी गहरा असर पड़ा।
- सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन: जनजातीय समाज के रीति-रिवाज और परंपराएँ भी प्रभावित हुईं। उन्हें अपने परंपरागत धर्म और आस्थाओं से दूर किया गया और कई जगहों पर ईसाई मिशनरियों का प्रभाव बढ़ा।
निष्कर्ष:
उपनिवेशवाद ने भारत के जनजातीय समाज पर गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव डाला। ब्रिटिश नीतियों ने न केवल उनकी पारंपरिक जीवनशैली को प्रभावित किया, बल्कि उनके अधिकारों का भी हनन किया। जनजातीय विद्रोहों ने यह स्पष्ट किया कि वे अपनी स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहे।
BSEB Class 8 Social science History Chapter 4 Notes “उपनिवेशवाद एवं जनजातीय समाज” में इन सभी घटनाओं और उनके प्रभावों को विस्तार से समझाया गया है। इस अध्याय के माध्यम से हम यह जान सकते हैं कि कैसे उपनिवेशवाद ने जनजातीय समाज की संरचना, अर्थव्यवस्था और संस्कृति को बदल दिया और किस प्रकार से उन्होंने अपनी स्वतंत्रता और अधिकारों के लिए संघर्ष किया।